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Sunday, December 10, 2017

हृदय परिवर्तन

🌹🌹 सुप्रभात 🌹 🌹

*⭕  हृदय परिवर्तन  ⭕*
~~~~~~~~~~~~~~

♦ एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था । बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया ।

♦ राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । सारी रात नृत्य चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा -
*"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।*
*एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय ।"*

♦ अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला । तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा ।

♦ जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो  उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं ।

♦ वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया ।

♦ उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया ।

♦ नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा - "बस कर, एक दोहे से तुमने वैश्या होकर भी सबको लूट लिया है ।"

♦ जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे - "राजा ! इसको तू वैश्या मत कह, ये तो अब मेरी गुरु बन गयी है । इसने मेरी आँखें खोल दी हैं । यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई ! मैं तो चला ।" यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े ।

♦ राजा की लड़की ने कहा - "पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ । आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही । क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?"

♦ युवराज ने कहा - "पिता जी ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था । लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है । धैर्य रख ।"

♦ जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया । राजा ने तुरन्त फैसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं । तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो ।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया ।

♦ यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि "हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना । बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।"

समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती । एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है । बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है ।

प्रशंसा से पिघलना नहीं चाहिए, आलोचना से उबलना नहीं चाहिए । नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते रहें । क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जाएगा ।

Friday, December 8, 2017

वेलाम सुत्त

*वेलाम सुत्त* :
*(अंगुत्तर निकाय)*

*एक बार तथागत भगवान बुद्ध अनाथपिण्डिक से बोले :*

       *अन्नदान रूखा-सूखा हो या उत्तम, जब वह अन्नदान श्रद्धा पुर्ण चित्त से, सत्कारपूर्वक, प्रसन्न मन से, शुद्ध चित्त से, अपने हाथ से दिया जाने पर, "यह पुनः लौटेगा" ऐसा सोचकर दिया जाने पर, उस दान का बहुत अच्छा फल प्राप्त होता है ।*

       उस दान के परिणामस्वरूप दाता को लंबे समय तक, अनेक जन्मों तक अच्छा भोजन, अच्छे वस्त्र, अच्छा यान उपलब्ध होते हैं । अधिक से अधिक पञ्चकामभोग उपलब्ध होते हैं । उसके स्त्री, पुत्र, पौत्र, परिवार जन, नौकर भी धर्म श्रवण में मन लगाते हैं । धर्म को जानने, समझने का प्रयास करते हैं । वह किस लिये ? वह इसलिए कि, श्रद्धा पुर्ण चित्त से, सत्कारपूर्वक, प्रसन्न मन से, शुद्ध चित्त से, अपने हाथ से दिये दान का यही फल होता हैं ।

       *लेकिन अगर वह अन्नदान अश्रद्धा पुर्ण चित्त से, असत्कारपूर्वक, अप्रसन्न मन से, अशुद्ध चित्त से दिया जाने पर, अपने हाथ से न दिया जानेपर, फेंक कर दिया जाने पर,  "यह पुनः लौटकर नहीं आयेगा" ऐसा सोचकर दिया जाने पर, उस दान का बहुत अच्छा फल नहीं प्राप्त होता है ।*
उस दान के परिणामस्वरूप न दाता को अच्छा भोजन, अच्छे वस्त्र, अच्छा यान उपलब्ध होते हैं । न उसके स्त्री, पुत्र, पौत्र, परिवार जन, नौकर धर्म श्रवण में मन लगाते हैं । न धर्म को जानने, समझने का प्रयास करते हैं । वह किस लिए,  वह इसलिए कि, अश्रद्धा पुर्ण चित्त से, असत्कारपूर्वक, अप्रसन्न मन से, अशुद्ध चित्त से दिये दान का यही फल होता है ।

      पहले कभी कोई वेलाम नामक ब्राह्मण हुआ था ।
उसने ऐसा महादान किया था : चौरासी हजार कन्या दान, चांदी से भरी हुई चौरासी हजार सोने की थालीयाँ, सोने से भरी हुई चौरासी हजार चांदी की थालीयाँ, सोने से भरी हुई चौरासी हजार कांस्य की थालीयाँ, विविध स्वर्णालंकारों से मण्डित, सुवर्ण ध्वजा युक्त तथा सुवर्ण जाल निर्मित लवादा से आच्छादित चौरासी हजार हाथी, सिंहचर्म, व्याघ्रचर्म तथा द्वीपचर्म से आवृत्त, विविध स्वर्णालंकारों से मण्डित, सुवर्ण ध्वजा युक्त तथा सुवर्ण जाल निर्मित लवादा से आच्छादित चौरासी हजार रथ, चौरासी हजार गौएं, चौरासी हजार महल (सभी मुल्यवान सामग्री से संपन्न) दान दिया ।
खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य आदि खाने पीने के पदार्थों की तो कोई कमी ही नहीं थी । मानो उनकी नदीयाँ बह रही हो । इतना बड़ा महा दान किया था ।

बुद्ध आगे बोले: गृहपति, वह वेलाम नामक ब्राह्मण कोई और नहीं, बल्कि मैं ही वह वेलाम नामक ब्राह्मण था ।मैने ही वह महा दान किया था । उस समय दान से कोई भी वंचित नहीं रह गया था ।

गृहपति, वेलाम ब्राह्मण के उस *महा दान से भी अधिक फलप्रद है- किसी सम्यक दृष्टि संपन्न (श्रोतापन्न) एक  भिक्षु को (साधक को) श्रद्धा पुर्ण चित्त से एक बार का दिया हुआ भोजन दान ।*

100 श्रोतापन्न को दिए भोजन दान से भी अधिक फलप्रद है एक सकृदागामी को एक समय का भोजन दान ।

*100 सकृदागामी को दिए भोजन दान से भी अधिक फलप्रद है एक अनागामी को एक समय का भोजन दान ।*

100 अनागामी को दिए भोजन दान से भी अधिक फलप्रद है एक अरहंत को एक समय का भोजन दान ।

*100 अरहंत को दिए भोजन दान से भी अधिक फलप्रद है एक पच्चेकबुद्ध को एक समय का भोजन दान ।*

100 पच्चेक बुद्धों को दिए भोजन दान से भी अधिक फलप्रद है एक सम्यक सम्बुद्ध को एक समय का भोजन दान ।

*सम्यक संबुद्ध को दिए भोजन दान से भी 100 गुना  अधिक फलप्रद है बुद्ध प्रमुख भिक्षु संघ को भोजन दान ।*

भिक्षु संघ को दिए भोजन दान से भी अधिक फलप्रद है, सभी दिशाओं के भिक्षु संघ के लिए बुद्ध प्रमुख भिक्षु संघ को विहार का दान ।

*बुद्ध प्रमुख भिक्षु संघ को दिए विहार दान से भी अधिक फलप्रद है- पांच शीलोंका का दृढ़ता से पालन करते हुए सदा के लिए बुद्ध, धर्म और संघ के प्रति समर्पित होना ।*

उससे भी अधिक फलप्रद है गंधमात्र भी मंगल मैत्री की भावना करें ।

*उस से भी अधिक फलप्रद है चुटकी बजाने जितने समय के लिए भी या पलक झपके इतने समय के लिए भी अनित्य-संज्ञा की भावना करें (अनित्यबोध हो) ।*

*🌷सबका मंगल हो 🌷*
           🙏🏻🙏🏻🙏🏻

साधना पथ पर प्रगति

💐💐   साधना पथ पर प्रगति   💐💐

मन प्रतिक्षण सक्रिय रहता है। साधना के समय मन पर बार-बार विचारों का आक्रमण होता रहता है।

ऐसे में यदि एक क्षण भी वर्तमान में स्थापित होता है तो बड़ा आराम महसूस होता है उसमें शक्ति है, मौन है, परम आनंद है।

उसके बाद ऐसे क्षणों की अवधि बढ़ाने की कोशिश करनी होती है।

वह कैसे करनी होगी ?

इस समय हम जो काम कर रहें हैं उसके प्रति जागरूक रहना होगा।

जैसे की हम चल रहें हैं तो चल रहे हैं, खा रहे हैं तो खा रहे हैं, लिख रहें हैं तो लिख रहें है, पढ़ रहें हैं तो पढ़ रहें हैं।

यों हर क्रिया के प्रति जागरूक रहना होगा। यह एक मानसिक व्यायाम ही है। परंतु साधना के लिये आवश्यक है।

चित्त में पुराने दबे हुए संस्कारों के अनेक आवरण हैं और प्रतिक्षण नए संस्कारों की वृद्धि के बीच ऐसे वर्तमान के क्षण में स्थिर रहना बहुत ही कठिन है। फिर भी बहुत महत्त्व का है।

ऐसे तूफ़ान में से वर्तमान क्षण पर स्थिर होने के प्रति प्रस्थान करना, आरूढ़ होना इसी का नाम सतिपठान है।

स्मृति में स्थापित होने पर भीतर चोर की भाँति छिप कर बैठे हुए वासना आदि के सारे विकार आहिस्ता-आहिस्ता बाहर निकल जाते हैं।

साधना करते करते कितने सारे विक्षेप साधक के अंदर में उठते हैं। उस समय समता धारण करना जरुरी है।

थोड़ी सी बैचनी, क्रोध या राग-द्वेष किये बिना समता को पुष्ट करने से, विक्षेपों की उपेक्षा करने से, साधना पथ पर प्रगति होती रहती है।

🌹🌹🌹  सबका मंगल हो  🌹🌹🌹

Is it against morality to kill an enemy if you are a member of the armed forces

#Vipassana #Meditation #SNGoenka

Q: Is it against morality to kill an enemy if you are a member of the armed forces?

A: Yes. But at the same time, the army is necessary for the protection of the country, for the protection of the civilians. The army should not be used just to kill others. It should be used to show the strength of the country, so that an enemy cannot even have the thought of being aggressive and harming people. Therefore, the army is necessary. But not to kill, just to show strength. If somebody is harming the country, then the first thing to do is to give a warning. Otherwise, if it becomes necessary, action has to be taken. But then again, the soldiers have to be trained not to have anger, not to have animosity. Otherwise, their minds will become unbalanced, all their decisions will go wrong. With a balanced mind, we can take good decisions, right decisions, which will be very helpful to us and helpful to others.

Saturday, November 25, 2017

प्रकृति के तीन नियम

****प्रकृति के तीन नियम****                                                 **प्रकृति  का पहला  नियम**
यदि खेत में  बीज न डालें जाएं  तो कुदरत  उसे घास-फूस  से  भर देती हैं ।
ठीक  उसी  तरह से  दिमाग  में सकारात्मक  विचार  न भरे  जाएँ  तो नकारात्मक  विचार  अपनी  जगह  बना ही लेती है । 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
**प्रकृति  का दूसरा  नियम**
जिसके  पास  जो होता है  वह वही बांटता  है।
सुखी "सुख  "बांटता है
दुःखी  "दुःख " बांटता  है
ज्ञानी "ज्ञान" बांटता है
भ्रमित  "भ्रम "बांटता है
भयभीत"  भय "बांटता   🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼                                     **प्रकृति  का तीसरा नियम**
आपको  जीवन से जो कुछ भी मिलें  उसे पचाना सीखो क्योंकि
भोजन  न पचने  पर रोग बढ़ते है।
पैसा न पचने  पर दिखावा बढ़ता है
बात  न पचने पर चुगली  बढ़ती है ।
प्रशंसा  न पचने पर  अंहकार  बढ़ता है।
निंदा  न पचने पर  दुश्मनी  बढ़ती है ।
राज न पचने पर  खतरा  बढ़ता है ।
दुःख  न पचने पर  निराशा बढ़ती है ।
और सुख न पचने पर  पाप बढ़ता है ।
बात  कड़वी है परंतु सत्य  है.... ओम् शांति

Friday, November 24, 2017

We have everything

A new born fish wanted to see water. It asked it's parents and they said this medium is water..it asked same question to everyone but got the same reply.
2. Next day this new born fish asked the blue whale.. about water and it also criticised. .that no  knows about "water' at all.
3. Blue whale asked the little gosh to sit on its back and took her to the shore. There it dropped on the shore and returned to water. .the little fish asked the same question what is water where is it how it looks like..
4.within few mins the little fish started shouting

I am unable to breath.. i am dying
5. The blue whale rushed towards the little fish and dropped bak in to water.
6. Moral? We have everything in.life but do not know it's value.. unless it is not available to us..or cease to exist
.  Some of us are like little fish.. gud one is it not? Spread the word
.  Most importantly spread the msg of being

Being in relationship in this thankless world. Regards.😊☺😀

Our mantra today

Our mantra today -

"I am a powerful being. I do not entangle with other energies to prove myself right. I withdraw from arguments and conserve my energy. I express my opinion but do not waste energy to prove myself. Truth does not need to be revealed ... it has the power to reveal itself."

Like we conserve water, fuel, electricity, let us conserve our emotional energies. Just to prove our self right in one situation, we should not deplete our happiness and health. To withdraw is not weakness, it is intelligence and strength.

*आज की प्रेरणा*

☀🔸☀♦🔅☀🔅♦☀🔸☀

✨💧✨ *आज की प्रेरणा* ✨💧✨

केवल प्रसन्नता ही एकमात्र इत्र है, जिसे आप दुसरों पर छिड़के तो उसकी कुछ बुँदे अवश्य ही आप पर भी पड़ती है।

*आज से हम* सदैव स्वयं भी खुश रहें और दूसरों को भी खुशियां ही दें...

✨💧✨ *INSPIRATION* ✨💧✨

Happiness is the only perfume, which if we sprinkle on others, then some of its drops definitely fall on us too.

*TODAY ONWARDS LET'S* always stay happy and give happiness to others too...

         *MADHUBAN*

☀🔸☀♦🔅☀🔅♦☀🔸☀

Thursday, November 23, 2017

प्रणाम का महत्व

प्रणाम का महत्व
महाभारत का युद्ध चल रहा था -
एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि -

"मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"

उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई -

भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|

तब -

श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -

श्री कृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -

शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -

द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने -
"अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!

"वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्री कृष्ण यहाँ लेकर आये है" ?

तब द्रोपदी ने कहा कि -

"हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं" तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया -

भीष्म ने कहा -

"मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्री कृष्ण ही कर सकते है"

शिविर से वापस लौटते समय श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि -

"तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है " -

" अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन- दुःशासन, आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती " -
......तात्पर्य्......

वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि -

"जाने अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है "

" यदि घर के बच्चे और बहुएँ प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर में कभी कोई क्लेश न हो "

बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं उनको कोई "अस्त्र-शस्त्र" नहीं भेद सकता -

"निवेदन - सभी इस संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाय।"

क्योंकि-

प्रणाम प्रेम है।
प्रणाम अनुशासन है।
प्रणाम शीतलता है।             
प्रणाम आदर सिखाता है।
प्रणाम से सुविचार आते है।
प्रणाम झुकना सिखाता है।
प्रणाम क्रोध मिटाता है।
प्रणाम आँसू धो देता है।
प्रणाम अहंकार मिटाता है।
प्रणाम हमारी संस्कृति है।

      
   
सबको प्रणाम

Tuesday, November 21, 2017

THE FOUR NOBLE TRUTHS & FAMILY RELATION

THE FOUR NOBLE TRUTHS & FAMILY RELATION------In a family parents, children, husband and wife are all bound by a thread of pleasant sensation derived from mutual interactions such as conversation, physical touch, sharing, security,etc.We are so much addicted to this pleasant sensation that we cannot bear separation, even for a moment.If a family member,say husband or wife or son dies,then the pleasant sensation derived from their interactions when alive,will turn into unpleasant one that leads to misery.A Vipassi very well understands the First Noble Truth of Suffering which is expressed both externally and internally.The external expression includes shedding tears,weeping, breast-beating,etc, and internally,it is experienced as increased intensity (degree) in four great elements such as heaviness,heat,movement and liquid.Then the Second Noble Truth of Suffering also becomes very clear which is nothing but addiction (attachment) towards pleasant sensation that comes from mutual interactions among family members,when alive.The reason for attachment is misunderstanding (Moha=illusion) of the true nature of pleasant sensation which is short-lived (anicca), can't be controlled (anatta) and any attempt to control its duration will invariably leads to misery(dukkha=dissatisfaction). The Third Noble Truth is the way out of misery(nibbana=ability to dispell all wrong perceptions or misunderstanding). It is the complete understanding of the anicca,anatta and dukkha nature of the pleasant sensation derived from our mutual interactions that enables us to remain mere observer without giving importance to the pleasant sensation (virago=detachment towards pleasant sensation).As virago is established ,the aversion towards unpleasant sensation (dosa) also disappears.Thus, a Vipassi becomes free from illusion, attachment and aversion.The Fourth Noble Truth' is the set of training that enables us to investigate the truth(the actual phenomenon that really occurs in nature and it can be directly encountered in our body which is nothing but a neurobiological experiencing structure.This path or method or technique is called Vipassana.The path is also called Dhamma which consists of sila, samadhi and Panna. A Vipassi must experience these four fold Noble Truths,not only in family relation, but in each and every aspect of life.The whole teaching of the Buddha is encapsulated (packed) in the form of four fold Noble Truth.As we progress in the path the Noble Truths become clearer and clearer in each and every situation and experience.Remember, nobody can escape from the jaws of death.Our near and dear ones are bound to die.Now, our only medicine is realisation of these four truths throughout in our life in order to remain calm and balanced whenever we will surely encounter the bitter truth of death of ours and our near and dear ones.

Wednesday, June 14, 2017

महाअवतार बाबाजी का संदेश :-योगी कथामृत

अनेकों के दोष के कारण सभी को दोषी मत मानो। इस जगत में हर चीज मिश्रित रूप में है शक्कर और रेत के मिश्रण की तरह चींटी की भांति बुद्धिमान बनो जो केवल शक्कर के गुणों को चुन लेती है और रेत के कणों को स्पर्श किए बिना छोड़ देती है।

लाहिड़ी महाशय का संदेश :- योगी कथामृत

लाहिड़ी महाशय स्वयं एक दृष्टि योगी थे और उन्होंने जो संदेश इस संसार को दिया वह आज के संसार की आवश्यकता शिक्षाओं के अनुरूप ही है प्राचीन भारत की उच्च कोटि की आर्थिक और धार्मिक परिस्थितियां अब नहीं रही इसीलिए भिक्षापात्र लिए भ्रमण करते रहने वाले योगी के प्राचीन आदर्श को उन्होंने प्रस्थान नहीं दिया बल्कि उन्होंने इस बात को अधिक लाभदायक बताते हुए उसी पर जोर दिया कि योगी को अपनी आजीविका का स्वयं उपार्जन करना चाहिए उसे पहले ही हार के नीचे दबे समाज पर अपने पोषण का और बोझ नहीं डालना चाहिए तथा अपने घर के एकांत में ही उसे योग साधना करनी चाहिए इस उपदेश में उन्होंने स्वयं अपना ही चल अनुदान जोड़ कर उसे और भी अधिक बल प्रदान किया वह एक ऐसे आदर्श आधुनिक योगी थे जिन्होंने आधुनिक समय की आवश्यकता ओं का ध्यान रखते हुए अनंत की साधना के महत्वपूर्ण अंगों को स्वयं ही तिलांजलि दे दी।

Friday, June 2, 2017

पतन का कारण

👌🏼 *पतन का कारण* :

श्रीकृष्ण ने एक रात को स्वप्न में देखा कि, एक गाय अपने नवजात बछड़े को प्रेम से चाट रही है।  चाटते-चाटते वह गाय, उस बछड़े की कोमल खाल को छील देती है । उसके शरीर से रक्त निकलने लगता है । और वह बेहोश होकर, नीचे गिर जाता है। श्रीकृष्ण प्रातः यह स्वप्न,जब भगवान श्री नेमिनाथ को बताते हैं । तो, भगवान कहते हैं कि :-

यह स्वप्न, पंचमकाल (कलियुग) का लक्षण है ।

कलियुग में माता-पिता, अपनी संतान को,इतना प्रेम करेंगे, उन्हें सुविधाओं का इतना व्यसनी बना देंगे कि, वे उनमें डूबकर, अपनी ही हानि कर बैठेंगे। सुविधा, भोगी और कुमार्ग - गामी बनकर विभिन्न अज्ञानताओं में फंसकर अपने होश गँवा देंगे।

आजकल हो भी यही रहा है। माता पिता अपने बच्चों को, मोबाइल, बाइक, कार, कपड़े, फैशन की सामग्री और पैसे उपलब्ध करा देते हैं । बच्चों का चिंतन, इतना विषाक्त हो जाता है कि, वो माता-पिता से झूठ बोलना, बातें छिपाना,बड़ों का अपमान करना आदि सीख जाते हैं ।

☝🏼 *याद रखियेगा !* 👇🏽

*संस्कार दिये बिना सुविधायें देना, पतन का कारण है।*
*सुविधाएं अगर आप ने बच्चों को नहीं दिए तो हो सकता है वह थोड़ी देर के लिए रोए।*
*पर संस्कार नहीं दिए तो वे जिंदगी भर रोएंगे।*

महाभारत

महाभारत I महाभारत में अर्जुन ने लडाई से इंकार कर दिया और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए उसके विभिन्न शंकाओं का निराकरण करना शुरु किया जिससे वह इस लडाई में हिस्सा लेने को तैयार हो जाए I भगवान के सभी वचनों को संयोजन गीता के अध्याय दर अध्याय अर्जुन को समझाने के पश्चात भी उसके तमाम शंकाओं का निराकरण तब तक संम्भव न हो सका जबतक उसने भगवान श्रीकृष्ण के असली स्वरूप का दर्शन न हुआ I और जैसे ही अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप का साक्षात्कार हुआ, उसके सभी प्रश्न, उसकी सभी शंकाएं स्वत: समाप्त हो गयीं और वह क्या कहता है........)
_ जब साक्षात्कार हुआ तो अर्जुन क्या कहता है....? “मुझे माफ़ करना, मैं नहीं जानता था कि आप कौन हैंI मैं तो समझता था कि आप मेरे मित्र हैं, मैं आपके साथ बैठता था, मुझे माफ़ करना मैं नहीं जानता था कि आप कौन है”I"
एक तो यह बात समझो कि- कैसे नहीं मालुम था अर्जुन को कि वे कौन हैं? जिसके अन्दर सारा संसार समाया हुआ है और जो सारे ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है, उसके साथ बैठने के बाद भी अर्जुन को नहीं मालुम था कि वे कौन हैं? अरे.....! कुछ तो लीक हो जाता न! इधर..... उधर! पर कुछ नहीं हुआI कोई खबर नहीं, पर जब साक्षात्कार हुआ और जब वह जान गया, ‘मान नहीं’..., ‘जान गया’ तब लडाई के लिए तो तैयार हो ही गया पर उससे पहले कहता है.... क्या? कि “मुझे माफ़ कर दो! मुझे नहीं मालुम था कि आप कौन हैंI”
यही साक्षात्कार का होना ही इस जिंदगी में ज्ञान को पाना है, क्योंकि तुम कहीं भी हो, किसी भी लडाई में हो, अर्जुन को तो सिर्फ एक लडाई लड़नी थी, तुमको तो कई लडाई लड़नी हैI ....नहीं? तुम्हारी तो कितनी महाभारत पड़ी है- बीवी के साथ महाभारत, पति के साथ महाभारत, सास के साथ महाभारत, बेटे के साथ महाभारत, पडोसी के साथ महाभारत, गवर्नमेंट के साथ महाभारत और जो बिजिनेस करने वाले हैं उनको तो टैक्स डिपार्टमेंट के साथ महाभारत करनी ही हैI तो कितनी ही

रामायण कथा का एक अंश

*रामायण कथा का एक अंश*
जिससे हमे *सीख* मिलती है *"एहसास"* की...
    🔰🔰🔰🔰🔰🔰

*श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता' मैया* चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत *पथरीली और कंटीली* थी !
की यकायक *श्री राम* के चरणों मे *कांटा* चुभ गया !

श्रीराम *रूष्ट या क्रोधित* नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से *अनुरोध* करने लगे !
बोले- "माँ, मेरी एक *विनम्र प्रार्थना* है आपसे, क्या आप *स्वीकार* करेंगी ?"

*धरती* बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !"

प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप *नरम* हो जाना !
कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना !
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे *आघात* मत करना"

श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई !
पूछा- "भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है ?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ?
फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी *व्याकुलता* क्यों ?"

*श्री राम* बोले- "नही...नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके *हृदय* को विदीर्ण कर देगा !"

*"हृदय विदीर्ण* !! ऐसा क्यों प्रभु ?",
*धरती माँ* जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !

"अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी *कंटीली राह* से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये *शूल* उनके पगों मे भी चुभे होंगे !
मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी *पीड़ा* सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप *कमल पंखुड़ियों सी कोमल* बन जाना..!!"

अर्थात
*रिश्ते* अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।
जहाँ *गहरी आत्मीयता* नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु *दिखावा* हो सकता है ।
🔰🔰
इसीलिए कहा गया है कि...
*रिश्ते*खून से नहीं, *परिवार* से नही,
*मित्रता* से नही, *व्यवहार* से नही,
बल्कि...
सिर्फ और सिर्फ *आत्मीय "एहसास"* से ही बनते और *निर्वहन* किए जाते हैं।
जहाँ *एहसास* ही नहीं,
*आत्मीयता* ही नहीं ..
वहाँ *अपनापन* कहाँ से आएगा l
     

Wednesday, May 31, 2017

चरणामृत का महत्व

.                   📝 चरणामृत का महत्व 👣💧
                    👣💧👣💧👣💧👣💧👣

💒 अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते हैं, क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है.?

📚❋ ━━► शास्त्रों में कहा गया है —

          "अकाल मृत्यु हरणं, सर्वव्याधि विनाशनम्।
          विष्णो: पादोदकं पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते॥"

📖 "अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप-व्याधियों का शमन करने वाला है, तथा औषधी के समान है।
💧 जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता॥"

जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है।

❋━━► जब भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए, और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे, तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया।

💧 वह चरणामृत गंगा जी बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये शक्ति उनके पास कहाँ से पात्र शक्ति है भगवान के चरणों की जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढ़ाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी।

👬 जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते हैं-
👣 "चरणों से निकली गंगा प्यारी, जिसने सारी दुनिया तारी",

📚 धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है।

💧 चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।

📚 कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।

💧चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।

📚 आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।

🌿❋━━► इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है।

🌿❋━━► तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए।

🌿❋━━► ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

📚 इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।

👣💧इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये।

👣❋━━► लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं.?

📚 दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।

😇 कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं, बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है।

💧इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।

         

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