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Saturday, December 9, 2017

Sammā-sati—right-awareness

🌷Sammā-sati—right-awareness🌷
(awareness of the reality of the present moment.)

Of the past there can only be memories; for the future there can only be aspirations, fears, imaginations.

You have started practising sammā-sati by training yourself to remain aware of whatever reality manifests at this moment, within the limited area of the nostrils.

You must develop the ability to be aware of the entire reality, from the grossest to the subtlest level.

To begin, you gave attention to the conscious, intentional breath, then the natural, soft breath, then the touch of the breath.

Now you will take a still subtler object of attention: the natural, physical sensations within this limited area. You may feel the temperature of the breath, slightly cold as it enters, slightly warm as it leaves the body. Beyond that, there are innumerable sensations not related to the breath: heat, cold, itching, pulsing vibrating, pressure, tension, pain, etc.

You cannot choose, because you cannot create sensations.

Just observe; just remain aware.

🌷 The name of the sensation is not important; what is important is to be aware of the reality, without reacting to it.

The habit pattern of the mind, you have seen, is to roll in the future or in the past, generating craving or aversion.

By practising right awareness, you have started to break this habit.

Not that after this course you will forget the past entirely, and have no thought at all for the future.

But in fact you used to waste so much energy by rolling needlessly in past or future, and therefore when you needed to remember or plan something, you could not do so.

By developing sammā-sati, you will learn to fix your mind more firmly in the present reality, and you will find that you can easily recall the past when needed, and can make proper provisions for the future.

You will be able to lead a happy, healthy life.

http://www.vridhamma.org/Home

https://www.dhamma.org/en/courses/search

(--Summaries of Discourses by S. N. Goenka: Day Two)

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🌷"विपश्यना"🌷

जैसे आना पान की साधना में हमारा प्रयास नैसर्गिक सांस (natural breath) को देखने का होता है वैसे ही विपश्यना में शारीरिक संवेदनाओ को देखना मात्र है।

हम अपना ध्यान पुरे शरीर पर क्रम से सिर से पैर तक, और पैर से सिर तक, एक छोर से दूसरी छोर तक ले जाते हैं।

परंतु ऐसा करते हुए हम किसी विशेष संवेदना की खोज और अन्य प्रकार की संवेदनाओ से बचने का प्रयास नहीं करते हैं।

हमारा प्रयास केवल उन्हें तटस्थ भाव(equanimity) से देखना होता है।

🌷पूरे शरीर में जो भी संवेदना प्रकट होती है उसके प्रति जागरूक रहना है। वे किसी भी प्रकार की हो सकती हैं-- गर्मी, सर्दी, भारीपन, हल्कापन, खुजलाहट, धड़कन, दर्द, दबाव, कम्पन आदि।

किसी असाधारण(extraordinary) संवेदना की खोज नहीं करनी है, अपितु केवल स्वाभाविक रूप से होने वाली साधारण शारीरिक संवेदनाओ को देखने का प्रयास करना है।

किसी संवेदना के कारण की खोज का प्रयास नहीं किया जाता।

यह मौसम, बैठने की मुद्रा, किसी पुरानी बीमारी, शारीरिक कमजोरी, या जो भोजन खाया है उससे भी उत्पन्न हो सकती हैं।

कारण महत्वहीन है और हमारी चिंता के बाहर है(the reason is unimportant and beyond our concern).

🌷 प्रारम्भ में केवल स्थूल(intense) संवेदनाओ का ही अनुभव करते हैं पर हम शरीर के प्रत्येक भाग पर क्रम से ध्यान ले जाना जारी रखते हैं।

ऐसा करते हुए हम केवल प्रमुख संवेदनाओ पर ही अनावश्यक रूप से ध्यान नहीं देते बल्कि एकाग्रता को सिलसिलेवार ढंग से (systematic order) शरीर के हर अंग पर होने वाली संवेदना को जागरूक होकर देखने में करते हैं।

जहाँ संवेदना स्पष्ट नहीं है वहां से छलांग लगाकर हम वहां नहीं जाते जहाँ वह स्पष्ट है। और न हम कुछ संवेदनाओ को देर तक देखते रहते हैं, और न अन्य की उपेक्षा(avoid) करते हैं।

हम इस प्रकार धीरे धीरे उस बिंदु पर पहुँचते हैं जहाँ से शरीर के हर अंग पर होने वाली संवेदनाओ का अनुभव कर सकते हैं।

🌷 परंतु संवेदनाए चाहे सुखद हों या दुखद, स्थूल हो या सूक्ष्म(intense or subtle) साधना के लिये यह सब अप्रासंगिक(irrelevant) है।

हमारा काम केवल तटस्थ भाव से देखना है।

दुखद संवेदनाओ से जो भी कष्ट हो, सुखद संवेदनाओ का जो भी आकर्षण हो, हम अपना काम रोकते नहीं, हम किसी संवेदना विशेष से न तो आकर्षित होते हैं और न विकर्षित(repelled)।

हमारा काम अपने आपको केवल उसी प्रकार, उसी तटस्थता के साथ (detachment) निरीक्षण करना है जिस प्रकार एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में निरीक्षण करता है।

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🌷विपश्यना:  ध्यान साधना की विधि 🌷

🌹जीवन में हर्ष- विषाद, सुख-दुःख के अवसर तो आते ही रहते हैं। इन स्थितियों में मानसिक संतुलन और समता बनाये रखने में ही जीवन की सफलता है।संसार में मनचाही, अनचाही होती ही रहती है।

विपश्यना ध्यान साधना की विधि ऐसी है जिसमे मन काया पर होने वाली संवेदनाओ को साक्षीभाव से, तटस्थ भाव से अनुभव करता है। विपश्यना न तो कोई जादू- टोना है और न ही सम्मोहन विद्या।

यह सत्य-दर्शन, अर्थात वर्तमान क्षण के यथार्थ को जानने की कला है, अंतर्मन की यात्रा है। मन में कोई विचार या विकार जागे तो उसके फलस्वरूप शरीर में उत्पन्न संवेदनाओ के प्रति राग या द्वेष न जगाकर समता भाव पुष्ट करना होता है।

विपश्यना जीवन के संघर्षो से पलायन नही, बल्कि जीवन के अभिमुख होकर समस्याओ का सामना करना सिखाती है।

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            🌷कर्म- विपाक🌷

विपश्यना साधना में जहाँ एक कर्म-विपाक का समूह उदीर्ण हुआ और प्रज्ञापूर्वक उसे क्षय कर लिया, वहां दूसरे कर्म- फलो का समूह तत्क्षण प्रकट होगा।

यों एक के बाद एक पुराने कर्मो के विपाक का ताँता लग जाता है। विपश्यना के प्रज्ञा- यज्ञ में उनकी आहुति लगती जाती है।यह क्रम जितनी देर तक चलता है, उतनी देर तक खिणन पुराणं होता रहता है।

परंतु जब कोई कर्म- विपाक अत्यंत घनीभूत पीड़ा के रूप में प्रकट होता है तो साधक की सारी सिट्टी- पिट्टी गुम हो जाती है, विद्या विलीन हो जाती है, प्रज्ञा क्षीण हो जाती है। पीड़ा के प्रति अम्मतव- भाव रख ही नहीं पाता। बौद्धिक स्तर पर भले अनित्य अनित्य करता रहे, परंतु वास्तविक स्तर पर ममत्व आ जाने के कारण उसे दूर करना चाहता है, और चाहने से वह दूर होती नहीं। अतः लगता है की यह तो नित्य है।

उस स्थूल ठोस पीड़ा की घनसंज्ञा नष्ट कर, सूक्ष्म प्रकम्पन की अनुभूति प्रज्ञामयी विपश्यना साधना के अभ्यास द्वारा ही होती है, जैसे कोई धुनिया कपास(रुई) की ग्रंथि को अपने धुनके के तार से प्रकम्पित कर खोलता है, कपास का एक एक तार अलग अलग कर देता है।

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🌹गुरूजी--

मेरे प्यारे साधक साधिकाओं!

धर्मप्रज्ञा जाग्रत रहे!
धर्मप्रज्ञा जाग्रत रखकर ही हम वर्तमान क्षण में जीना सिख सकेंगे।
यह क्षण जो की अभी अभी उतपन्न हुआ है, यही तो हमारे काम का है।
जो क्षण बीत चुके उनको हम याद भले कर लें, पर उनमे हम जी नही सकते।
जो क्षण अभी आये नही उनकी हम कल्पना या कामना भले कर लें परंतु उनमे हम जी नही सकते।
हमारे जीने के लिये तो यही क्षण है जो अभी अभी उत्पन्न हुआ है।
अगर हम इस क्षण में जीते हैं तो ही सही माने में जीते हैं, अन्यथा तो केवल जीने का बहाना करते हैं, वस्तुतः जीते नही।क्योंकि वर्तमान क्षण ही तो यथार्थ है और यथार्थ में जीना ही तो सही जीना है।

🌺इस नन्हे से क्षण में जीने की कला हासिल करने के लिये ही यह विपश्यना साधना है, जिसमे कि हम इस क्षण उत्पन्न होने वाली स्थिति को बिना भूत और भविष्य के साथ जोड़े हुए इसके यथार्थ स्वरुप में देख सकने का अभ्यास करते हैं।

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